पानी का रंग कैसा?

गायक मुकेश ने वर्षों पहले पूछा था-
‘पानी रे पानी तेरा रंग कैसा…’
.
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.
इस गाने का जवाब इतने साल बाद परम ज्ञानी गुरु श्री यो यो हनी सिंह से मिला-
‘…ब्लू है पानी पानी पानी…’



सिद्धार्थ सरीन (Courtesy – Navbharat times)

“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा” – Bal Gangadhar Tilak

bal-gangadhar-tilak-justiceउपरोक्त कथन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सिपाहियों में से एक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के हैं. लोकमान्य तिलक ही थे जिन्होंने सर्वप्रथम स्वराज का नारा उठाया था. आज लोकमान्य तिलक की पुण्यतिथि है तो चलिए आज उन्हें श्रद्धांजलि दें और अपनी यादों में उन्हें जीवित करें.

Bal Gangadhar TilakBal Gangadhar Tilak in Hindi
बाल गंगाधर का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था. उनका बचपन का नाम केशव बाल गंगाधर तिलक था. बचपन से ही देशप्रेम की भावना उनमें कूटकूट कर भरी थी. प्रारम्भिक शिक्षा मराठी में प्राप्त करने के बाद गंगाधर को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने के लिए पूना भेजा गया. उन्होंने डेक्कन कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की. उनका सार्वजनिक जीवन 1880 में एक शिक्षक और शिक्षक संस्था के संस्थापक के रूप में आरम्भ हुआ. इसके बाद ‘केसरी’ और ‘मराठा’ जैसे समाचार पत्र उनकी आवाज के पर्याय बन गए.

Bal Gangadhar Tilak on Swaraj
कांग्रेस की स्थापना के बाद पहली बार स्वराज का नारा बाल गंगाधर तिलक ने दिया ही था. कांग्रेस की स्थापना तो वर्ष 1885 में हो चुकी थी. वर्ष 1929 में एक प्रस्ताव पारित होने से पहले किसी ने भी स्वराज का दावा प्रस्तुत नहीं किया था जबकि तिलक इससे काफी पहले [वर्ष 1897 में] यह मांग कर चुके थे. वह स्वराज के पहले दावेदार थे. उनकी ही भांति बोस ने भी यह संकल्प अपनाया.

गणेश उत्सव की शुरूआत
लोकमान्य तिलक ने राष्ट्रवाद की भावना विकसित करने के लिए लोगों को एकत्रित करने के उद्देश्य से 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में गणेश उत्सव मनाने की परंपरा शुरू की थी. इस बारे में उनके प्रपौत्र ने कहा कि लोकमान्य ने गणेश उत्सव की परंपरा लोगों को एक स्थान पर इकट्ठा कर उन्हें राष्ट्रवाद की ओर मोड़ने के लिए शुरू की थी.

क्रांति के सहायक
लोकमान्य तिलक एक राष्ट्रवादी होने के साथ ही अपने क्रांतिकारी विचारों के लिए भी जाने जाते थे. बतौर संपादक उन्होंने खुदीराम बोस जैसे युवा क्रांतिकारियों का खुलकर पक्ष लिया और अंग्रेजी हुकूमत को अपने निशाने पर रखा. वर्ष 1890 में कांग्रेस में शामिल हुए तिलक की उनकी उदारवादी विचारधारा के लिए आलोचना होने लगी. वह कांग्रेस के गरम दल का प्रतिनिधित्व करते थे. वह वर्ष 1907 में कांग्रेस से अलग हुए, लेकिन दोबारा वर्ष 1916 में इसमें शामिल हो गए. इस बीच, उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना और एनी बेसेंट के साथ आल इंडिया होम रूल लीग का भी गठन किया.
तिलक ने भारतीय समाज में कई सुधार लाने के प्रयत्न किए. वे बाल-विवाह के विरुद्ध थे. उन्होंने हिन्दी को सम्पूर्ण भारत की भाषा बनाने पर ज़ोर दिया. भारतीय संस्कृति, परम्परा और इतिहास पर लिखे उनके लेखों से भारत के लोगों में स्वाभिमान की भावना जागृत हुई.

Death of Bal Gangadhar Tilak in Hindi
देश के इस महान नेता ने 01 अगस्त, 1920 को अपनी आखिरी सांसें लीं. उनकी मौत से दुखी होकर महात्मा गांधी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता और नेहरू जी ने भारतीय क्रांति के जनक की उपाधि दी थी. उनके निधन पर लगभग 2 लाख लोगों ने उनके दाह-संस्कार में हिस्सा लिया.

Bal Gangadhar Tilak (or Lokmanya Tilak; 23 July 1856 – 1 August 1920; About this sound pronunciation , born as Keshav Gangadhar Tilak, was an Indian nationalist, journalist, teacher, social reformer, lawyer and an independence activist. He was the first leader of the Indian Independence Movement. The British colonial authorities called him “Father of the Indian unrest.” He was also conferred with the honorary title of “Lokmanya”, which literally means “accepted by the people (as their leader)”.[1]

Tilak was one of the first and strongest advocates of “Swaraj” (self-rule) and a strong radical in Indian consciousness. He is known for his quote, “Swaraj is my birthright, and I shall have it!” in India. He formed a close alliance with Muhammad Ali Jinnah, later the founder of Pakistan, during the Indian Home Rule Movement.

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Bal Gangadhar Tilak (29th Couplet) Described by British as “The Father of Indian Unrest ” Tilak was born on 23.07.1856. His slogan, “Swaraj (Self Rule) is my birthright”, inspired millions of Indians. His book “Geetarahasya”a classic treatise on Geeta in Marathi was written by him, in prison at Mandalay.Great journalist- editor, an authority on Vedas, Sanskrit Scholar, mathematician and a natural leader of India. Died 01.08.1920 “Swaraj is our birthright,” thundered Tilak, the Lion of India.He founded schools andpublished newspapers, all for his motherland. He rotted in a distant jail at Manda lay, in Burma. he wore himself out till his last breath, to awaken his countrymen.

Author : M. S. Narasimha Murthy

“If 5 sheep eat up all the grass in a meadow in 28 days, how many sheep will eat up the grass in 20 days?”

“Seven sheep, sir,” flashed back the answer even before the teacher finished his question.

‘Who is it that answered without working out the sum?” Thundered the teacher.

Two or three voices shouted, “Bal, sir.”

The teacher went near Bal. He took his note book and glanced through it. Should he not at least take down the problem, let alone work it out?

“Where have you worked the sum?”

Bat, with a mischievous smile, pointed to his head with his index finger.

“You should work the problem in your. book,” the teacher said.

‘Why? I will do it orally,” replied Bat.

Bal’s classmates found it difficult to under- stand certain problems even when the teacher did them thrice. But, to Bat mathe- matics was as easy as drinking Water. Sanskrit, of course, was like peeled banana to him!

Chandra Shekhar Azad … [1906-1931] ……. ‘जन्मदिवस पर महान क्रन्तिकारी को श्रद्धासुमन’

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चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय
काकोरी ट्रेन डकैती और साण्डर्स की हत्या में शामिल निर्भय क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद, का जन्म 23 जुलाई, 1906 को उन्नाव, उत्तर प्रदेश में हुआ था. चंद्रशेखर आजाद का वास्तविक नाम चंद्रशेखर सीताराम तिवारी था. चंद्रशेखर आजाद का प्रारंभिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भावरा गांव में व्यतीत हुआ. भील बालकों के साथ रहते-रहते चंद्रशेखर आजाद ने बचपन में ही धनुष बाण चलाना सीख लिया था. चंद्रशेखर आजाद की माता जगरानी देवी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं. इसीलिए उन्हें संस्कृत सीखने लिए काशी विद्यापीठ, बनारस भेजा गया. दिसंबर 1921 में जब गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन की शुरूआत की गई उस समय मात्र चौदह वर्ष की उम्र में चंद्रशेखर आजाद ने इस आंदोलन में भाग लिया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित किया गया. जब चंद्रशेखर से उनका नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम आजाद और पिता का नाम स्वतंत्रता बताया. यहीं से चंद्रशेखर सीताराम तिवारी का नाम चंद्रशेखर आजाद पड़ गया था. चंद्रशेखर को पंद्रह दिनों के कड़े कारावास की सजा प्रदान की गई.

क्रांतिकारी जीवन
1922 में गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया गया. इस घटना ने चंद्रशेखर आजाद को बहुत आहत किया. उन्होंने ठान लिया कि किसी भी तरह देश को स्वतंत्रता दिलवानी ही है. एक युवा क्रांतिकारी प्रनवेश चैटर्जी ने उन्हें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन जैसे क्रांतिकारी दल के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल से मिलवाया. आजाद इस दल और बिस्मिल के समान स्वतंत्रता और बिना किसी भेद-भाव के सभी को अधिकार जैसे विचारों से बहुत प्रभावित हुए. चंद्रशेखर आजाद के समर्पण और निष्ठा की पहचान करने के बाद बिस्मिल ने चंद्रशेखर आजाद को अपनी संस्था का सक्रिय सदस्य बना दिया. अंग्रेजी सरकार के धन की चोरी और डकैती जैसे कार्यों को अंजाम दे कर चंद्रशेखर आजाद अपने साथियों के साथ संस्था के लिए धन एकत्र करते थे. लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के साथ मिलकर सॉण्डर्स की हत्या भी की थी. आजाद का यह मानना था कि संघर्ष की राह में हिंसा होना कोई बड़ी बात नहीं है इसके विपरीत हिंसा बेहद जरूरी है. जलियांवाला बाग जैसे अमानवीय घटनाक्रम जिसमें हजारों निहत्थे और बेगुनाहों पर गोलियां बरसाई गईं, ने चंद्रशेखर आजाद को बहुत आहत किया जिसके बाद उन्होंने हिंसा को ही अपना मार्ग बना लिया.

झांसी में क्रांतिकारी गतिविधियां
चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित समय के लिए झांसी को अपना गढ़ बना लिया. झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे. अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छ्द्म नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे. वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे. झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी.

चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह
1925 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की गई. 1925 में काकोरी कांड हुआ जिसके आरोप में अशफाक उल्ला खां, बिस्मिल समेत अन्य मुख्य क्रांतिकारियों को मौत की सजा सुनाई गई. जिसके बाद चंद्रशेखर ने इस संस्था का पुनर्गठन किया. भगवतीचरण वोहरा के संपर्क में आने के बाद चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के भी निकट आ गए थे. इसके बाद भगत सिंह के साथ मिलकर चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजी हुकूमत को डराने और भारत से खदेड़ने का हर संभव प्रयास किया.

(chandrashekhar azad death)चंद्रशेखर आजाद का निधन
1931 में फरवरी के अंतिम सप्ताह में जब आजाद गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलने सीतापुर जेल गए तो विद्यार्थी ने उन्हें इलाहाबाद जाकर जवाहर लाल नेहरू से मिलने को कहा. चंद्रशेखर आजाद जब नेहरू से मिलने आनंद भवन गए तो उन्होंने चंद्रशेखर की बात सुनने से भी इंकार कर दिया. गुस्से में वहां से निकलकर चंद्रशेखर आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ एल्फ्रेड पार्क चले गए. वे सुखदेव के साथ आगामी योजनाओं के विषय में बात ही कर रहे थे कि पुलिस ने उन्हे घेर लिया. लेकिन उन्होंने बिना सोचे अपने जेब से पिस्तौल निकालकर गोलियां दागनी शुरू कर दी. दोनों ओर से गोलीबारी हुई. लेकिन जब चंद्रशेखर के पास मात्र एक ही गोली शेष रह गई तो उन्हें पुलिस का सामना करना मुश्किल लगा. चंद्रशेखर आजाद ने पहले ही यह प्रण किया था कि वह कभी भी जिंदा पुलिस के हाथ नहीं आएंगे. इसी प्रण को निभाते हुए उन्होंने वह बची हुई गोली खुद को मार ली.

पुलिस के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी. उनके शरीर पर गोली चला और पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही चंद्रशेखर की मृत्यु की पुष्टि हुई.

बाद में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जिस पार्क में उनका निधन हुआ था उसका नाम परिवर्तित कर चंद्रशेखर आजाद पार्क और मध्य प्रदेश के जिस गांव में वह रहे थे उसका धिमारपुरा नाम बदलकर आजादपुरा रखा गया.

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Chandra Shekhar Azad (1906-1931)

Chandra Shekhar was born on 23 July 1906 in village Bhavra in Jhabua district of Madhya Pradesh to Pandit Sita Ram Tiwari and Jagrani Devi. He received his early schooling in Bhavra. For higher studies he went to the Sanskrit Pathashala at Varanasi.

Young Chandra Shekhar was fascinated by and drawn to the great national upsurge of the non-violent, non-cooperation movement of 1920-21 under the leadership of Mahatma Gandhi. When arrested and produced before the magistrate, he gave his name as ‘Azad’, his father’s name as ‘Swatantra’ and his residence as ‘prison’. The provoked magistrate sentenced him to fifteen lashes of flogging. The title of Azad stuck thereafter.

After withdrawal of the non-cooperation movement, Azad was attracted towards revolutionary activities. He joined the Hindustan Socialist Republican Army (HSRA) and was involved in the Kakori Conspiracy (1926), the attempt to blow up the Viceroy’s train (1926), the Assembly bomb incident, the Delhi Conspiracy, the shooting of Saunders at Lahore (1928) and the Second Lahore conspiracy.

Azad was on the wanted list of the police. On 27February 1931, in the Alfred Park, Allahabad, when an associate betrayed him, well-armed police circled Azad. For quite sometime he held them at bay, single-handedly with a small pistol and few cartridges. Left with only one bullet, he fired it at his own temple and lived up to his resolve that he would never be arrested and dragged to gallows to be hanged. He used to fondly recite a Hindustani couplet, his only poetic composition:

 

‘Dushman ki goliyon ka hum samna karenge,

Azad hee rahein hain, azad hee rahenge’

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मुकेश के कुछ हिट गानों को जरूर सुनें, सुबह-सुबह मूड फ्रेश हो जायेगा…
“दिल है हिंदुस्तानी”

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